ब्रम्हचारी शांता बेन
जन्म – अमरेली के पास स्थित ग्राम ढ़सा ढोलखा में मोसाण में वि. सं. 1966 फाल्गुन सुदी 11 कों जन्म हुआ था |
माता पिता – पिता का नाम मणिलाल खारा मां का नाम दीवाणी बेन | शांता बेन के भाई खारा कड़क स्वाभाव के थे |
भाई-बहन – कांता बेन श्री, सविता, मंजुला, लाभु बेन, भाई मुकुंद भाई खारा
शिक्षा – प्रारम्भ में कलकत्ता रहे वहां से ही शिक्षा प्रारम्भ हुई | बाद में अमरेली आकर कक्षा 6 तक शिक्षा हुई |
विवाह -पति का नाम जेतपुर निवासी रतिलाल था |
वैराग्य प्रसंग – 6 माह में शांता बेन विधवा हो गई | 16 वर्ष में दीक्षा लेने का भाव आया | विधवा होने पर पिता ने पूछा कैसा लग रहा हैं? शांता बेन बोली – निर्वृत्ति की प्रसन्नता हो रही हैं | पूरे जीवन सती समान रही | घर में दीक्षा हेतु पात्र भी आ गया था | शांता बेन इन्हे आहार लेना – दोहराना सिखाती थी |
पूर्व भव – इनका नाम लाभ बाई था | वहां शादी हुई थी | पिता का नाम परम सेठ था | माता का नाम गणधारी था | भविष्य के गणधर का नाम चंद्रकीर्ति होगा |
गुरुदेव श्री से परिचय – 1935 में गुरुदेव ने गड़ढ़ा चातुर्मास किया | तब बेन श्री ने गुरुदेव के प्रथम दर्शन किये |
समाधि साधना – अंतिम समय शरीर में जलन, हृदय गैस चढ़ती थी | कैंसर के भाई जैसा ही कोई कष्टकारी रोग था |
मृत्यु – 24 जून 1988 में शुक्रवार जेठ सुदी 10 सं. 2043
ब्रह्मचारिणी शांता बहन का पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी की प्रभावना (धर्म प्रसार) में योगदान अत्यंत अद्वितीय और आधारभूत रहा है। उन्हें गुरुदेव के शासन की ‘आधारशिला’ और ‘शासन माता’ माना जाता है।गुरुदेव के प्रवचन प्रवाहपूर्ण और मौलिक होते थे। शांता बहन ने उन गहन आध्यात्मिक वचनों को अत्यंत सावधानी से लिपिबद्ध किया । आज जो ‘समयसार प्रवचन’ के अनेक भाग और अन्य ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनका मूल आधार शांता बहन द्वारा तैयार किए गए नोट्स ही हैं। उनके इस पुरुषार्थ के बिना गुरुदेव की वाणी को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाना असंभव था । जैन दर्शन में कहा गया है कि ‘उपदेश’ से अधिक ‘आचरण’ प्रभावना करता है। शांता बहन का जीवन सादगी, निस्पृहता और आत्म-साधना का जीवंत उदाहरण था। उनके उच्च वैराग्य को देखकर हजारों लोगों के मन में गुरुदेव द्वारा बताए गए मार्ग के प्रति अटूट श्रद्धा पैदा हुई ।गुरुदेव आत्म-रमणता और तत्व-चर्चा में लीन रहते थे, जबकि शांता बहन ने पर्दे के पीछे रहकर पूरे व्यवस्था तंत्र को संभाला । उन्होंने सोनगढ़ में स्वाध्याय की एक ऐसी पद्धति विकसित की जिससे मुमुक्षु तत्व के गहरे जानकार बने । उन्होंने समाज की सैकड़ों बहनों को ब्रह्मचर्य और आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी ।सोनगढ़ आने वाले हर जिज्ञासु और मुमुक्षु को उन्होंने एक माँ की तरह आध्यात्मिक और व्यावहारिक संबल दिया। किसी भी विचारधारा की प्रभावना तब स्थिर होती है जब उसे वात्सल्य और अनुशासन का साथ मिले, जो शांता बहन ने बखूबी निभाया ।उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि गुरुदेव के सिद्धांतों और आगम की मर्यादा में कोई मिलावट न हो। ‘आत्मधर्म’ पत्रिका और अन्य प्रकाशनों के माध्यम से उन्होंने शुद्ध दिगंबर जैन धर्म की प्रभावना को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया । शांता बहन ने अपनी लेखनी, अपने प्रबंधन और अपने पवित्र जीवन से गुरुदेव के आध्यात्मिक आंदोलन को एक ‘संगठित स्वरूप’ प्रदान किया। उनके बिना इस युग की यह महान आध्यात्मिक क्रांति इतनी व्यापक नहीं हो पाती।
ब्रह्मचारिणी शांता बहन का पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी की प्रभावना (धर्म प्रसार) में योगदान अत्यंत अद्वितीय और आधारभूत रहा है। उन्हें गुरुदेव के शासन की ‘आधारशिला’ और ‘शासन माता’ माना जाता है।गुरुदेव के प्रवचन प्रवाहपूर्ण और मौलिक होते थे। शांता बहन ने उन गहन आध्यात्मिक वचनों को अत्यंत सावधानी से लिपिबद्ध किया । आज जो ‘समयसार प्रवचन’ के अनेक भाग और अन्य ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनका मूल आधार शांता बहन द्वारा तैयार किए गए नोट्स ही हैं। उनके इस पुरुषार्थ के बिना गुरुदेव की वाणी को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाना असंभव था । जैन दर्शन में कहा गया है कि ‘उपदेश’ से अधिक ‘आचरण’ प्रभावना करता है। शांता बहन का जीवन सादगी, निस्पृहता और आत्म-साधना का जीवंत उदाहरण था। उनके उच्च वैराग्य को देखकर हजारों लोगों के मन में गुरुदेव द्वारा बताए गए मार्ग के प्रति अटूट श्रद्धा पैदा हुई ।गुरुदेव आत्म-रमणता और तत्व-चर्चा में लीन रहते थे, जबकि शांता बहन ने पर्दे के पीछे रहकर पूरे व्यवस्था तंत्र को संभाला । उन्होंने सोनगढ़ में स्वाध्याय की एक ऐसी पद्धति विकसित की जिससे मुमुक्षु तत्व के गहरे जानकार बने । उन्होंने समाज की सैकड़ों बहनों को ब्रह्मचर्य और आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी ।सोनगढ़ आने वाले हर जिज्ञासु और मुमुक्षु को उन्होंने एक माँ की तरह आध्यात्मिक और व्यावहारिक संबल दिया। किसी भी विचारधारा की प्रभावना तब स्थिर होती है जब उसे वात्सल्य और अनुशासन का साथ मिले, जो शांता बहन ने बखूबी निभाया ।उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि गुरुदेव के सिद्धांतों और आगम की मर्यादा में कोई मिलावट न हो। ‘आत्मधर्म’ पत्रिका और अन्य प्रकाशनों के माध्यम से उन्होंने शुद्ध दिगंबर जैन धर्म की प्रभावना को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया । शांता बहन ने अपनी लेखनी, अपने प्रबंधन और अपने पवित्र जीवन से गुरुदेव के आध्यात्मिक आंदोलन को एक ‘संगठित स्वरूप’ प्रदान किया। उनके बिना इस युग की यह महान आध्यात्मिक क्रांति इतनी व्यापक नहीं हो पाती।
