04.-Himmat-Bhaiपंडित हिम्मत भाई शाह

 जन्मतिथि –  श्रावण वदी 8 संवत 2528,  25 – 8 – 1908
 श्रवण वदी 14 संवत 1964 बड़वाण |
 माता-पिता का नाम – तेजबा एवं जेठालाल शाह | चंपा बेन से 6 वर्ष बड़े भाई थे |
 शिक्षा –  संवत 1925 में मैट्रिक प्रथम श्रेणी से पास हुए थे | बी.एम.सी. अहमदाबाद गुजरात कॉलेज से की |
 प्रथम परिचय – 1927 में गुरुदेव से परिचित हुए थे |

सरलता – 55 वर्ष से सोनगढ़ रहे | कभी प्रवचन नहीं किया, आपकी अमर रचना समोसरण स्तुति, समयसार स्तुति,  गुरुदेव स्तुति आदि अविस्मरणीय हैं |

रचनात्मक कार्य-  आपकी अमर रचना समोशरण स्तुति, समयसार स्तुति, गुरुदेव श्री स्तुति आदि अविस्मरणीय है |
प्रशंसा –  गुरुदेव एक बार पाट ऊपर बैठे थे तब बोले यह गृहस्थ है नहीं तो मेरे पास पाट ऊपर बैठता |
सीधा सरल और समर्पित जीवन –  गुरुदेव श्री, भक्ति के बाद कभी भी संस्कृत टीका आदि के संबंध में बुलाकर चर्चा करते थे,
सादगी अहिंसक जीवन था | कभी नौकरानी से भी सफाई नहीं कराई |  ट्रस्ट को जमा पूंजी दी उसी के ब्याज से खर्च चलाया | अनुवाद की स्टेशनरी स्वयं के व्यय से लाते थे | आदि पुराण के आधार से समयसार स्तुति लिखी |
पंडित हिम्मत भाई शाह, पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के शासन के एक अनन्य विद्वान

और मूर्धन्य साहित्यकार थे। जहाँ ब्रह्मचारी हरिभाई ने व्यवस्था और संगठन का पक्ष संभाला, वहीं पंडित हिम्मत भाई ने गुरुदेव के आध्यात्मिक संदेश को बौद्धिक और शास्त्रीय गहराई प्रदान की।उनका योगदान मुख्य रूप से ‘लेखन’ और ‘तत्व-विवेचन’ के क्षेत्र में क्रांतिकारी माना जाता है:गुरुदेव श्री कानजी स्वामी घंटों तक प्रवचन देते थे, जिनमें गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य होते थे। पंडित हिम्मत भाई ने उन मौखिक प्रवचनों को लिपिबद्ध किया और उन्हें शास्त्रीय ग्रंथों (जैसे समयसार, प्रवचनसार) की टीकाओं के साथ तालमेल बिठाकर संपादित किया । उन्होंने गुरुदेव के विचारों को इतनी सटीकता से शब्दों में पिरोया कि पढ़ने वाले को ऐसा महसूस होता था मानो वह साक्षात् गुरुदेव को सुन रहा हो।

हरिभाई ने जहाँ इस पत्रिका की व्यवस्था संभाली, वहीं पंडित हिम्मत भाई ने लंबे समय तक इसके संपादक के रूप में कार्य किया।

उनकी पैनी दृष्टि और शुद्ध भाषा शैली के कारण ‘आत्मधर्म’ जैन जगत की सबसे प्रतिष्ठित आध्यात्मिक पत्रिकाओं में शुमार हुई। उन्होंने कठिन दार्शनिक विषयों को अत्यंत सरल और सुबोध भाषा में जनता के सामने रखा। वे दिगंबर जैन आगमों (शास्त्रों) के प्रकांड पंडित थे। गुरुदेव जब भी किसी सूक्ष्म गाथा पर चर्चा करते, हिम्मत भाई उस पर प्राचीन आचार्यों (जैसे कुंदकुंद देव, अमृतचंद्र देव) के संदर्भों को जोड़कर उसकी पुष्टि करते थे । उन्होंने ‘समयसार सिद्धि’ और अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के माध्यम से गुरुदेव के सिद्धांतों को तर्क और न्याय की कसौटी पर सिद्ध किया । हिम्मत भाई केवल लेखक नहीं थे, बल्कि वे एक ओजस्वी वक्ता भी थे । गुरुदेव की अनुपस्थिति में या बड़े शिविरों में वे तत्व की ऐसी चर्चा करते थे कि श्रोता भाव-विभोर हो जाते थे । उन्होंने अनेक युवाओं को जैन दर्शन की ओर आकर्षित किया और उन्हें शास्त्रीय अध्ययन की प्रेरणा दी ।

विशेषता: पंडित हिम्मत भाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विनम्रता थी। इतना गहरा ज्ञान होने के बावजूद वे स्वयं को सदैव गुरुदेव का एक छोटा सा शिष्य ही मानते थे और उनका पूरा जीवन गुरुदेव की बात को “ज्यों का त्यों” दुनिया तक पहुँचाने में बीत गया।