09.-Babubhai-Mehtaपंडित बाबू भाई जी मेहता

 जन्मतिथि –  संवत 1985 श्रवण सुदी पूनम 20 अगस्त 1929 को खानपुर में जन्म हुआ | मत्यु – 22-05-1985 जेठ सुदी 2, 2041 |
 माता – पिता का नाम – पिता का नाम चुन्नीलाल मेहता सबसे बड़े भाई मणिलाल एवं आपसे छोटे अमृत भाई और उनसे छोटे जयंतीलाल हैं |
शिक्षा – 10 वीं तक शिक्षित थे |
परिवार – 19 वर्ष की उम्र में तारा बहन से शादी हो गई 30 वर्ष में ब्रह्मचर्य ले लिया 43 वर्ष की उम्र में वैशाख सुदी 3, 2028 पंचकल्याण फतेहपुर में माता-पिता बने थे | शर्मिंष्ठा नाम की कन्या मुंबई रहती है एकमात्र पुत्र भी गुजर गया |
व्यवसाय – रूफ शीट का व्यापार करने भावनगर जाते थे तालोद के एक भाई मंगालाल जीवराज शाह के साथ गए | धर्म रूचि नहीं थी |  खाने-पीने ठहरने का तो मिलेगा ऐसा सोचकर शनिवार रविवार बिताने चले गए |  प्रवचन समझ में नहीं आए तो लौट के घर आ गए |  मांगा लाल जी ने प्रवचन को गंभीरता से लेने को कहा तो फिर चार-पांच दिन के लिए आए इधर दो-तीन वर्ष में लड़का गुजर गया |  व्यापार में छापा पड़ गया | गुरुदेव के पास जाने से भी विरक्ति हो गई|  अब तो बारंबार गुरुदेव को सुना |
 गुरुदेव श्री से परिचय – 1960 में गुरुदेव के श्रोता बनें | एक दिन भरे प्रवचन में हर्ष विभोर हो गए |
रचनात्मक कार्य – 18 घंटे बोलने का रिकॉर्ड बाबू भाई जी का है | तत्व प्रीति – कठोर श्रम करने की यह एक मिसाल है |

पंडित बाबूभाई मेहता जी (बाबूभाई एम. मेहता) का पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के शासन में योगदान एक “मौन साधक” और “कुशल साहित्यकार” का रहा है । जहाँ रामजी भाई बापूजी को संगठन के लिए जाना जाता है, वहीं बाबूभाई मेहता जी को गुरुदेव के प्रवचनों को शब्द देने और तत्व को गहराई से समझाने के लिए याद किया जाता है । गुरुदेव श्री के प्रवचनों में अक्सर काठियावाड़ी लहजा और गहरा आध्यात्मिक मर्म होता था। बाबूभाई मेहता जी ने उन प्रवचनों को बहुत ही सरल, शुद्ध और सुव्यवस्थित भाषा में संपादित किया। आज जो हम ‘प्रवचनप्रसाद’ या अन्य ग्रंथ पढ़ते हैं, उन्हें उस रूप में लाने में बाबूभाई जी की लेखनी का बड़ा हाथ है। सोनगढ़ से निकलने वाली सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘आत्मधर्म’ (गुजराती और हिंदी) के वे लंबे समय तक संपादक रहे । इस पत्रिका के माध्यम से गुरुदेव का संदेश घर-घर पहुँचा । उनकी संपादन कला ऐसी थी कि कठिन से कठिन बात भी पाठक के गले उतर जाती थी । बाबूभाई जी को कुंदकुंद आचार्य देव के समयसार और उसकी आत्मख्याति टीका का अद्भुत ज्ञान था । गुरुदेव अक्सर प्रवचनों के दौरान गूढ़ विषयों पर उनसे चर्चा करते थे। उन्होंने गुरुदेव के सान्निध्य में रहकर शास्त्रों के जो रहस्य समझे, उन्हें अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के सामने रखा । वे केवल एक संपादक नहीं थे, बल्कि एक उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने कई जैन ग्रंथों का गुजराती में अनुवाद और विवेचन किया। उनकी भाषा में एक विशेष प्रकार की मिठास और स्पष्टता थी, जो दिगंबर जैन समाज के विद्वानों के लिए आज भी एक बेंचमार्क है । सोनगढ़ में होने वाले स्वाध्यायों में उनकी उपस्थिति और उनके द्वारा दी जाने वाली स्पष्टता मुमुक्षुओं के लिए बहुत मार्गदर्शक होती थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुदेव के प्रति समर्पित कर दिया और कभी भी यश की इच्छा नहीं की ।  अगर पूज्य गुरुदेव “तत्व के वक्ता” थे, तो बाबूभाई मेहता जी उस तत्व को कागज़ पर उतारने वाले “सक्षम कलमकार” थे । उनके बिना गुरुदेव का साहित्य इतना व्यवस्थित और पठनीय शायद ही हो पाता ।