पण्डित श्री कैलाश चन्द्रजी
शिक्षा – मथुरा चौरासी में 3 वर्ष पश्चात सहारनपुर के जम्बू विद्यालय में।
‘अहो तदेप पाण्डित्यं यत्संसारात् समुद्धरेत’ अर्थात् वही पाण्डिय सार्थक है, जिससे निज का उद्धार हो। यह परम सत्य वाक्य, सम्प्रति अभिनन्दनीय पण्डित कैलाशचन्द्रजी, जिन्हें हम प्यार से’ डण्डेवाले पण्डितजी’ के नाम से पुकारते हैं, उन पर शत-प्रतिशत लागू होता है।
ज्ञान के आलोक पुरुष आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कानजीस्वामी के अतीन्द्रिय आनन्द का हमें जो मार्ग बताया, उसी को आदरणीय पण्डित कैलाशचन्द्रजी ने निस्वार्थभाव से अपनी वाणी एवं लेखनी से आगे बढ़ाया है। जिनवाणी की निस्पृह उपासना की प्रेरणा, सोनगढ़ के सन्त पूज्य गुरुदेवश्री से प्राप्त हुई। आपने अपना जीवन उनकी भावना के अनुरूप आर्षपरम्परा से प्राप्त जिनवाणी माँ की आराधना और उसके सर्वांगीण विकास में निरोग अवस्था में करते रहे।
वीतरागशासन प्रभावक पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, तद्भक्त पूज्य बहिनश्री चम्पाबेन एवं आत्मसाधना स्थली तीर्थधाम स्वर्णपुरी के प्रति समर्पित, पण्डित कैलाशचन्द्र जैन अलीगढ़वालों से कौन अपरिचित है? आदरणीय पण्डितजी, पूज्य गुरुदेवश्री के अनन्यभक्त रहे हैं और गुरुदेवश्री से प्राप्त तत्त्वज्ञान को अपने सोनगढ़ प्रवास के दौरान प्रवचन मण्डप में प्रातः काल कक्षाओं के माध्यम से मुमुक्षुओं को पढ़ाया करते थे। इसके साथ-साथ पूरे देश में घूम-घूमकर इस वीतरागी तत्त्वज्ञान का जो प्रचार-प्रसार किया है, वह निश्चित ही प्रशंसा के योग्य है।
आदरणीय पण्डितजी के हृदय में पूज्य गुरुदेवश्री एवं बहिनश्री के प्रति अत्यन्त भक्तिभाव था, वे कहते हैं कि पूज्य गुरुदेवश्री ने भरतक्षेत्र को विदेहक्षेत्र और पंचम काल को चौथा काल बना दिया है। इसी तरह गुरुदेवश्री की तुलना, वर्तमान में तीर्थंकर जैसा योग और बहिनश्री की तुलना, वर्तमान में गणधर जैसे योग से करनेवाले उनके वचन निश्चित ही उनके हृदय में व्याप्त ज्ञानी-धर्मात्माओं के प्रति भक्तिभाव को प्रदर्शित करते हैं।
पूज्य गुरुदेवश्री की सातिशय वाणी के प्रचार-प्रसार हेतु आपकी प्रेरणा से निर्मित तीर्थधाम मङ्गलायतन भी वर्तमान में पूज्य गुरुदेवश्री की धर्म देशना का जो प्रचार-प्रसार कर रहा है, उसमें भी आदरणीय पण्डितजी की महती भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
