
पंडित रतन चंद्र भारिल्ल
जन्मतिथि – अगहन कृष्ण अष्टमी संवत 1989, 21 नवंबर 1932
माता का नाम – पार्वती बाई
पिता का नाम – उमराव सिंह के पुत्र हरदास।
पत्नी का नाम – 19 वर्ष की उम्र में 1953 में कक्षा 6 पास 14 वर्षीय कन्या से विवाह (श्रीमती कमला भारिल्ल) शासकीय योजना के तहत हायर सेकेंडरी एवं बीटी ट्रेनिंग लेकर 1966 से 14 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया।
शिक्षा – 1939 में अनोरा पढ़ने जाना पड़ता था तब आप कक्षा एक वाहन मेरी तीन बहन एवं डॉक्टर साहब की दो तक पढ़ाई हुई 10 वर्ष की आयु में पपौरा में जैन धर्म की विधिवत शिक्षा 5 माह हुई। 1947 से 53 तक मुरैना शास्त्री एवं न्याय मध्यमा वर्ष (क्वींस कॉलेज बनारस वांगिए संस्कृत एसोसिएशन कोलकाता एवं मुंबई प्रांतीय परीक्षा बोर्ड से विशारद 14 में से मात्र दो भाई उत्तीर्ण हुए थे।) हमारी गलती ना होने पर भी 50 पैसे का दंड या दो बैंक खाने माफी मांगने को कहा तब हम छोड़कर 1953 में कुंदकुंद विद्यालय राजाखेड़ा से (धौलपुर) से एवं शास्त्रीय तीसरे वर्ष की शिक्षा। न्यायतीर्थ की परीक्षा दे ना सके क्योंकि इंदौर केंद्र निरस्त हो गया और हम तब तक कोलकाता पहुंच ना सके।(1954–न्यायतीर्थ)
1962 मैं विदिशा में हाई स्कूल से लेकर ma एवं b.Ed किया।
पुत्र का नाम – शादी के 14 वर्ष बाद 1966 में जन्म शुद्धात्म प्रकाश भरील्ल “बबलू” बहू संध्या ,संतान सर्वज्ञ , कु.सर्वदर्शी
गुरुदेव श्री का परिचय – 1957 में क्रमबद्ध पर्याय की संग्रहित दो अंक मिले तब से साक्षात मिलने का भाव था । 1959 में सोनगढ़ जाना हुआ वहीं से खुरई प्रवचन के लिए भेजा गया।
रचना – संपादक – अप्रैल 1977 से जनपद प्रदर्शन का संपादन विदिशा से प्रारंभ किया था 1979 में प्रथम रचना संस्कार छपी। संग्रहणीय अंक समाचार मनुष्यों की दृष्टि में, निमित्त उत्पादन ,हिमचंद्र भाई, रामजी भाई, बाबू भाई मेहता, बनारसी दास, आचार्य कुंदकुंद,।
16 जनवरी 2005 को रत्नदीप नाम का अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित हुआ
पंडित रतनचंद भारिल्ल जी का नाम दिगंबर जैन समाज में और विशेष रूप से गुरुदेव श्री कांजी स्वामी द्वारा प्रवर्तित अध्यात्म मार्ग की प्रभावना में बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है।
भारिल्ल जी एक प्रखर लेखक थे। उन्होंने गुरुदेव श्री के आध्यात्मिक संदेशों को सरल और सुबोध भाषा में जन-जन तक पहुँचाने के लिए विपुल साहित्य की रचना की। उनके लेख और पुस्तकें आत्म-कल्याण की भावना से ओतप्रोत हैं, जो दिगंबर जैन आगम के रहस्यों को स्पष्ट करती हैं। गुरुदेव श्री हमेशा ‘कुन्दकुन्द-कहान’ (आचार्य कुन्दकुन्द और स्वयं के प्रवचनों) के मार्ग पर जोर देते थे। भारिल्ल जी ने अपनी विद्वता के माध्यम से यह सिद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि गुरुदेव श्री का मार्ग पूरी तरह से प्राचीन दिगंबर जैन आगम और आचार्य कुन्दकुन्द देव की परंपरा के अनुरूप है। उन्होंने विद्वानों की नई पीढ़ी तैयार करने में बड़ा योगदान दिया। ‘टोडरमल स्मारक’ और अन्य शिक्षण संस्थानों के माध्यम से उन्होंने ऐसे वक्ता और विद्वान तैयार करने में मदद की, जो गुरुदेव श्री के बताए ‘शुद्धातम’ के मार्ग को वैज्ञानिक ढंग से समाज के सामने रख सकें। भारिल्ल जी की शैली तार्किक और प्रभावशाली थी। उन्होंने देश-विदेश में भ्रमण कर अपनी ओजस्वी वाणी से तत्वज्ञान का प्रचार किया। उनके प्रवचनों ने मुमुक्षु समाज को गुरुदेव श्री के विचारों की गहराई समझने में संबल प्रदान किया।
सोनगढ़ और अन्य मुमुक्षु आश्रमों की गतिविधियों को व्यवस्थित करने और वैचारिक स्पष्टता लाने में उनका मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने तत्व चर्चाओं और गोष्ठियों के माध्यम से समाज की शंकाओं का समाधान किया।
पंडित रतनचंद भारिल्ल जी ने अपनी कलम और वाणी को गुरुदेव श्री के ‘वीतराग विज्ञान’ के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। वे उन स्तंभों में से एक थे जिन्होंने गुरुदेव के आध्यात्मिक क्रांति के बीज को एक वटवृक्ष बनाने में सहयोग दिया ।