13. Pandit abhinandan ji khaniyadhna

ब्र. अभिनन्दन कुमार जी खनियाधाना

जन्म तिथि –  ४-६-१९४६ गूडर (खनियाधाना) शिवपुरी मध्य प्रदेश
माता-पिता का नाम – स्व. गंगा बाई स्व. मल्धुराम जैन
शिक्षा –  शास्त्री
गुरुदेवश्री का परिचय –  १९६९ से प्रतिवर्ष सोनगढ़ गये । १९७१ में खनियाधाना में बड़े दादा पधारे थे १० दिन का शिविर लगा वहीँ से यहाँ क्रान्ति हुई | इस शिविर में प. ज्ञान चन्द्र जी विदिशा छहडाला एवं धनालाल जि गवालिअर रत्नकरंडश्रावकाचार पर प्रवचन करते थे । रतनचन्द्र जी मोक्षमार्ग प्रकाशक पर प्रवचन करते थे |
रचनात्मक कार्य –  वड़ोदरा पञ्च कल्याणक में १९८० में प्रतिष्ठाचार्य धन्नालाल जी ने पगड़ी पहना कर जिम्मेदारी दी | प्रतिष्ठाचार्य देश विदेश लन्दन, कनाडा, अमेरिका में पञ्च कल्याणक कराये | एक प्रतिष्ठा पाठ की रचना की (अप्रकाशित ) |
आपके निर्देशन में खनियाधाना में भारत प्रसिद्ध नन्दीश्वर मन्दिर ११३ फुट चौड़ा, ११३ फुट ऊंचा, ११३ लघु शिखर, ११३ सुवर्ण कलश, ११३ से दुगुनी लम्बाई, ११३ किलो का घंटा, ११३ माह में बनकर तैयार, गुरुदेव श्री की ११३ वी जन्म जयंती पर सन २००२ में पञ्च कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ |
यहाँ एक नन्दीश्वर विद्यालय एवं छात्रावास भी संचालित हैं । जिसमें ८०० छात्र एवं ५५ छात्र क्रममशः अध्ययनरत है ।
प्रेरक प्रसंग –  भोपाल में टेलरिंग का काम जमा लिया था तब बड़े दादा ने प्रेरणा की यहाँ कहाँ जीवन खो रहे हो उन्हें जयपुर पढने को ले गये | प्रथम बेच के आप सफल विद्यार्थी हो | व्र. परस राम जी एवं ब्र. चेतनलाल जी के सानिध्य में आपको वैराग्य आया एवं सादगी पूर्ण जीवन जीने लगे थे ।

प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी पंडित अभिनंदन जी शास्त्री (खनियाधाना), दिगंबर जैन मुमुक्षु समाज के एक अत्यंत ऊर्जावान और समर्पित विद्वान हैं। गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के तत्वज्ञान और उनके द्वारा बताए गए वीतराग मार्ग की प्रभावना में अभिनंदन जी का योगदान विशेष रूप से नौजवानों को अध्यात्म से जोड़ने और सिद्धांतों की निडर प्रस्तुति के लिए जाना जाता है।

अभिनंदन जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी शैली है। वे अपनी ओजस्वी वाणी से कठिन दार्शनिक विषयों (जैसे समयसार की गाथाएँ) को भी वर्तमान संदर्भों में ढालकर युवाओं को समझाते हैं। उनके प्रभाव से कई युवा कुरीतियों को छोड़कर स्वाध्याय और संयम के मार्ग पर आए हैं।

वे देशभर में होने वाले पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवों में प्रतिष्ठाचार्य के रूप में अपनी सेवाएँ देते हैं। उनकी देखरेख में होने वाली प्रतिष्ठाओं में ‘शुद्धता’ और ‘विधि-विधान’ का कड़ाई से पालन किया जाता है। वे प्रतिष्ठा के माध्यम से जीव को ‘बाहर की क्रिया’ से हटाकर ‘अन्तर के वैभव’ (निज आत्मा) की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं | गुरुदेव श्री द्वारा प्रतिपादित ‘निश्चय-व्यवहार’ के सुमेल और ‘क्रमबद्ध पर्याय’ जैसे गहरे सिद्धांतों को वे बहुत ही निर्भीकता और तर्कों के साथ प्रस्तुत करते हैं। तत्व चर्चाओं और गोष्ठियों में उनकी तार्किक क्षमता गुरुदेव श्री के मार्ग को पुष्ट करती है।

खनियाधाना और अन्य क्षेत्रों में धार्मिक शिक्षण शिविरों  के माध्यम से वे बच्चों और बड़ों को जैन भूगोल, कर्म सिद्धांत और अध्यात्म की शिक्षा देते हैं। वे केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि गुरुदेव श्री के प्रति अटूट श्रद्धा और आदर का भाव भी जगाते हैं। खनियाधाना को मुमुक्षु समाज में एक सक्रिय केंद्र बनाने में उनका बड़ा हाथ है। उनके सान्निध्य में वहाँ नियमित रूप से प्रवचन, गोष्ठियाँ और धार्मिक उत्सव होते हैं, जिससे स्थानीय समाज में गुरुदेव श्री की प्रभावना निरंतर बढ़ रही है।

 पंडित अभिनंदन जी का व्यक्तित्व गुरुदेव श्री के मार्ग के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और सिद्धांतों की स्पष्टता का मिश्रण है। वे ‘कहान मार्ग’ के एक सशक्त स्तंभ के रूप में उभरकर सामने आए हैं।