vitragvandana Hamare guruvar

हमारे गुरूवर त्रय


तीर्थ की स्थापना तीर्थंकर के कदमों से होती है और गुरु परंपरा से आगे बढ़ती है। महावीर भगवान के शासन में तीन केवली और पांच श्रुतकेवली हुए उनके पश्चात गुरु परंपरा चलती रही मगर द्वादशांग श्रुतज्ञान क्षीण और विघटित होता चला और अंगभूत ज्ञान ही बचा । अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी आचार्य जी की  परम्परा में दो समर्थ मुनिराज हुए  एक श्रीधरसेन आचार्य और दूसरे श्री गुणधर आचार्य। श्री धरसेन आचार्य को ग्यारहवें पूर्व के पांचवें वस्तु अधिकार के महाकर्म प्रकृति के चौथे प्राभृत का ज्ञान था और उनके निर्देशन में भूतबलि और पुष्पदंत जैसे समर्थ मुनिराजों ने षट्खंडागम की रचना की और उसके तत्पश्चात आचार्यों ने धवला, गोम्मटसार, लब्धिसार, क्षपणासार आदि शास्त्रों की रचनाएं हुईं और इस प्रकार प्रथम श्रुतस्कंध की उत्पत्ति हुई। श्री गुणधर आचार्य को ज्ञानप्रवाद पूर्व के दसवें वस्तु के तीसरे प्राभृत का ज्ञान था उस ज्ञान से तत्पश्चात आचार्यों ने सिद्धांतों की रचना की। इसप्रकार सर्वज्ञ महावीर भगवान से चला आता मोक्ष मार्ग का प्रयोजनभूत ज्ञान आचार्यों की परंपरा से कुंदकुंद आचार्यदेव को प्राप्त हुआ और उन्होंने कई पाहुड की रचना की जिसमें अष्टपाहुड की रचना सर्वोत्तम रही । तत्पश्चात सीमंधर स्वामी का उपदेश ग्रहण कर उन्होंने पंच परमागम की रचनाएं करके उन्होंने मोक्ष मार्ग को खोल दिया। इस तरह द्वितीय श्रुतखंडकी रचना हुई। मोक्ष प्राप्त करने के प्रयोजनभूत ज्ञान की प्राप्ति हमें उनके माध्यम से हुई इसलिए वे हमारे परमगुरु है। उनके 1000 साल पश्चात हुए अमृतचंद्रआचार्य ने कुंदकुंद आचार्य देव के तीन शास्त्र पंचास्तिकायसार, प्रवचनसार और समयसार पर सटीक टीकाएं बनाकर, समयसार शास्त्र की गाथा पर कलश की रचनाएं करके और तीनों शास्त्रों पर परिशिष्ट की रचना कर हमारे पर बड़ा उपकार किया है। पंचास्तिकायसार, प्रवचनसार और समयसार पर लिखी उनकी टीकाएं इतनी युक्तियों से भरी हैं कि मानो कुंदकुंद आचार्यदेव के हृदय में बैठ कर लिखीं हो। अमृतचंद्रआचार्य के 1000 साल बाद गुरुदेव श्री कानजी स्वामी हुए उन्होंने 45 साल तक कुंदकुंद रचित सभी आगमों पर कई बार विस्तार से खुले मंच से प्रवचन दिए और उनकी प्रेरणा से तत्वज्ञान का इतना प्रचार प्रसार हुआ कि वह जैनियों के घर घर पहुंच गया। इन तीनों गुरुओं का का हम पर प्रत्यक्ष और परोक्ष उपकार है। दूसरी खास बात यह है कि तीनों ने व्यवहार का उपदेश एवं प्रेरणा दी मगर दृष्टि के विषय में उसे निचोड़ कर निकाल दिया। हम कह सकते हैं कि “कुंदकुंद आगम दियो कहान गुरु उपदेश, अमृतचंद्र आचार्य से सीखो युक्ति अनेक”।