हमारे आगम
दिगम्बर परम्परा में कुंदकुंद आचार्य देव का स्थान गणधर गौतम के बाद लिया जाता है ।
मंगलम भगवान वीरो, मंगलम गौतमो गणी ॥
मंगलम कुंदकुंदाद्यो, जैन धर्मोस्तु मंगलम ॥
याने कि कुंदकुंद आचार्य देव द्वारा रचित शास्त्रों को गणधरदेव तुल्य आगमों में स्थान प्राप्त है। श्वेताम्बर परंपरा में 36 आगमों का उल्लेख है मगर उनमें काफी कुछ कल्पनाएं प्रवेश कर चुकी हैं । कुंदकुंद आचार्यदेव ने 11 वर्ष की आयु में दीक्षित होकर गुरु परंपरा से कई आगमों का अध्ययन किया और कई आगमों की रचनाएं की जिसे पाहुड नाम प्राप्त हुआ । उन्होंने अपने जीवन काल में 84 से अधिक पाहुडों की रचनाएं की। 44 वर्ष की आयु में उन्हें आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया और उन्हें श्वेताम्बर मत को खंडित करने के पक्ष में कुछ करने को कहा गया जिसके फलस्वरूप उन्होंने अष्टपाहुड की रचनाएं की जो काफी अहम रही। इसके बावजूद भी उन्हें मोक्षमार्ग प्रस्थापित करने में कुछ कमियां लगी कुछ खटक महसूस हुई आहट सी हुई। भरतक्षेत्र में भगवान की मौजूदगी नहीं मैं समाधान भी किस्से करूं?? फलस्वरूप उन्हें विदेहक्षेत्र में सीमंधरस्वामी के समवशरण में पेश होने का मौका मिला, वे वहां आठ दिन रहे भगवान की दिव्यदेशना सुनी। श्रुत केवली से वस्तु स्वरूप की चर्चाएं की और उन्होंने अपनी सभी शंकाओं का समाधान पाया । वहां से लौटकर उन्होंने रयणसार, पंचायतिकायसार, प्रवचनसार, समयसार और नियमसार नामक पंच परमागमों की रचनाएं की। जो मोक्ष साधने में प्रयोजनभूत है। दिगम्बर परम्परा में इसे आगम के तौर पर स्वीकृति मिली। इन पांचों परमागमों में से अमृतचंद आचार्य ने पंचास्तिकायसार, प्रवचनसार और समयसार शास्त्रों पर अमृत टीकाएं लिखी और कलशों की रचनाएं की और यह प्राभृतत्रय नामसे प्रसिद्ध हुए। इनमें मोक्षमार्ग का सटीक और स्पष्ट वर्णन मिलता है । जो हमारे आगम बने।

