
ब्रह्मचारी धन्य कुमार जी वेलोकर (डासाला) का नाम गुरुदेव श्री कांजी स्वामी के शासन में एक अत्यंत समर्पित विद्वान और ओजस्वी वक्ता के रूप में लिया जाता है। उनका योगदान मुख्य रूप से विदर्भ (महाराष्ट्र) क्षेत्र और ग्रामीण भारत में तत्व ज्ञान की गहरी पैठ बनाने में रहा है।
गुरुदेव श्री का संदेश मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान में केंद्रित था, लेकिन धन्य कुमार जी ने इसे महाराष्ट्र, विशेषकर विदर्भ (अकोला, बुलढाणा, नागपुर) के गाँवों और शहरों तक पहुँचाया। उन्होंने मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में तत्व का सरल प्रतिपादन किया।
बुलढाणा जिले के एक छोटे से गाँव डासाला को उन्होंने अपनी साधना और प्रभावना का केंद्र बनाया। उनके पुरुषार्थ से वहां बड़े स्तर पर स्वाध्याय शिविरों का आयोजन हुआ, जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में दिगंबर जैन धर्म के वास्तविक स्वरूप के प्रति जागृति आई। उनकी प्रवचन शैली बहुत ही तार्किक और आगम पर आधारित थी। वे आचार्य कुंदकुंद के ‘समयसार’ और ‘प्रवचनसार’ की गाथाओं को बहुत ही सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते थे। उनका मुख्य जोर ‘भेद-विज्ञान’ और ‘स्व-पर विवेक’ पर रहता था। उन्होंने कई युवाओं को ब्रह्मचर्य और त्याग के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनके सानिध्य में कई मुमुक्षुओं ने स्वाध्याय की गहराई को समझा और तत्व-ज्ञान को अपने जीवन में उतारा।
सोनगढ़ और अन्य मुमुक्षु मंडलों के साथ समन्वय बिठाकर उन्होंने विदर्भ के मंदिरों और स्वाध्याय भवनों के जीर्णोद्धार और वहां नियमित तत्व चर्चा शुरू करवाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
संक्षेप में: यदि वजु भाई शाह को गुरुदेव के साहित्य का स्तंभ माना जाता है, तो धन्य कुमार जी वेलोकर को क्षेत्रीय प्रभावना और जन-जन तक तत्व पहुँचाने वाला एक समर्पित सेनानी माना जा सकता है। उनकी सादगी और निर्भीक तत्व चर्चा आज भी महाराष्ट्र के मुमुक्षु समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
