पंडित बाबू भाई जी मेहता
पंडित बाबूभाई मेहता जी (बाबूभाई एम. मेहता) का पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के शासन में योगदान एक “मौन साधक” और “कुशल साहित्यकार” का रहा है । जहाँ रामजी भाई बापूजी को संगठन के लिए जाना जाता है, वहीं बाबूभाई मेहता जी को गुरुदेव के प्रवचनों को शब्द देने और तत्व को गहराई से समझाने के लिए याद किया जाता है । गुरुदेव श्री के प्रवचनों में अक्सर काठियावाड़ी लहजा और गहरा आध्यात्मिक मर्म होता था। बाबूभाई मेहता जी ने उन प्रवचनों को बहुत ही सरल, शुद्ध और सुव्यवस्थित भाषा में संपादित किया। आज जो हम ‘प्रवचनप्रसाद’ या अन्य ग्रंथ पढ़ते हैं, उन्हें उस रूप में लाने में बाबूभाई जी की लेखनी का बड़ा हाथ है। सोनगढ़ से निकलने वाली सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘आत्मधर्म’ (गुजराती और हिंदी) के वे लंबे समय तक संपादक रहे । इस पत्रिका के माध्यम से गुरुदेव का संदेश घर-घर पहुँचा । उनकी संपादन कला ऐसी थी कि कठिन से कठिन बात भी पाठक के गले उतर जाती थी । बाबूभाई जी को कुंदकुंद आचार्य देव के समयसार और उसकी आत्मख्याति टीका का अद्भुत ज्ञान था । गुरुदेव अक्सर प्रवचनों के दौरान गूढ़ विषयों पर उनसे चर्चा करते थे। उन्होंने गुरुदेव के सान्निध्य में रहकर शास्त्रों के जो रहस्य समझे, उन्हें अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के सामने रखा । वे केवल एक संपादक नहीं थे, बल्कि एक उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने कई जैन ग्रंथों का गुजराती में अनुवाद और विवेचन किया। उनकी भाषा में एक विशेष प्रकार की मिठास और स्पष्टता थी, जो दिगंबर जैन समाज के विद्वानों के लिए आज भी एक बेंचमार्क है । सोनगढ़ में होने वाले स्वाध्यायों में उनकी उपस्थिति और उनके द्वारा दी जाने वाली स्पष्टता मुमुक्षुओं के लिए बहुत मार्गदर्शक होती थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुदेव के प्रति समर्पित कर दिया और कभी भी यश की इच्छा नहीं की । अगर पूज्य गुरुदेव “तत्व के वक्ता” थे, तो बाबूभाई मेहता जी उस तत्व को कागज़ पर उतारने वाले “सक्षम कलमकार” थे । उनके बिना गुरुदेव का साहित्य इतना व्यवस्थित और पठनीय शायद ही हो पाता ।
