03.-Hari-Bhai
ब्रह्मचारी हरिभाई सोनगढ़

जन्म – वीर सं. 2451 वि.स. 1980 पोष सुदी पूनम 1924
जेतपुर – मोराबी में पोष कृ ३ रात्री 10 बजे सोनगढ में अवसान
माता – अचरत बेन
पिता – अमृतलाल काशीदास मेहता ।

शिक्षा – समयसार 100 वार, जयधवल, धवल की दो वार ।

गुरुदेव श्री का परिचय –  1942 में आषाढ शु. 2  को  ताऊजी  के साथ 19 वर्ष की उम्र में राजकोट में 4 दिन का लाभ  लेने आये, प्रथम दिन ही आपने डायरी में लिखा । आत्मा द्रव्य दृष्टि से जो है सो ही है । वापिस मोरबी आने के लिए स्टेशन गये तो के साथ ट्रेन निकल गई। फिर तो  आप स्वामीजी के साथ सोनगढ़ आ गए।
रचनात्मक कार्य – समयसार जी के गुरुदेव श्री के प्रवचन लिखने का कार्य सर्वप्रथम किया।
ब्रह्मचारी हरिभाई (सोनगढ़) का पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी द्वारा प्रवर्तित दिगंबर जिनधर्म  की प्रभावना में अतुलनीय और ऐतिहासिक योगदान रहा है। उन्हें गुरुदेव के “दाहिने हाथ” और सोनगढ़ के प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है।

वि.सं. 1996 में राजकोट में पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी के दर्शन करने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई ।  गुरुदेव के प्रवचनों से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी डायरी में पहला सूत्र लिखा— “आत्मा द्रव्यदृष्टि से जो है वह वही है”।

सुंदर लिखावट और गहरी समझ के कारण उन्हें गुरुदेव के प्रवचनों की प्रेस-कॉपी तैयार करने का कार्य सौंपा गया, जिसकी शुरुआत उन्होंने ‘श्री समयसार’ जी के प्रवचनों से की। हरिलाल भाई 32 वर्षों तक ‘आत्मधर्म’ (गुजराती) पत्रिका के संपादक रहे और गुरुदेव के अध्यात्म संदेश को देश-विदेश में पहुँचाया।

पूज्य गुरुदेव ने उनकी लेखन कला की सराहना करते हुए कहा था कि जो भाव मैं कहता हूँ, हरिलाल उसे सटीक शब्दों में लिखता है; ऐसा लेखक पूरे हिंदुस्तान में ढूंढने से भी नहीं मिलेगा । उन्होंने जैन धर्म से संबंधित 150 से अधिक सचित्र पुस्तकों का संकलन किया। बच्चों के लिए उनकी कृति ‘जिनबालपोथी’ अत्यंत लोकप्रिय हुई, जिसकी लाखों प्रतियाँ छपीं।

ब्रह्मचर्य व्रत: संवत 2003 फागुन सुद 2 के दिन उन्होंने गुरुदेव के समक्ष जीवनभर ब्रह्मचर्य पालन करने का संकल्प लिया।

 वे गुरुदेव की छाया बनकर रहते थे और उनकी हर यात्रा में साथ रहते थे।

जब गुरुदेव बीमार थे, तब हरिलाल भाई उन्हें समयसार की गाथाएँ और भजन सुनाकर उनके दर्द को भुलाने में मदद करते थे। गुरुदेव के अंतिम सांस के समय भी वे उनके पास ही थे।

समाधि और देह त्याग माघ वद 3 की रात को जब उन्हें हृदय में दर्द हुआ, तो उन्होंने पहले ही बता दिया था कि 15 मिनट में यह देह छूट जाएगी।

दृढ़ वैराग्य: अंतिम समय में डॉक्टर को बुलाने के बजाय उन्होंने मुमुक्षुओं से धर्म की बातें करने को कहा और स्वयं को ‘ज्ञायक’ भाव में लीन कर लिया।

समाधि: हाथ जोड़कर पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करते हुए, 63 वर्ष की आयु में उन्होंने अत्यंत शांतिपूर्वक और सुवीरता के साथ देह त्याग दी।