08.-Ramji-BHai-Doshiरामजी भाई बापूजी

जन्म- अवसान जन्म स्थान – गोंडल (कठियाबाड़)
1887-1991 कुल आयु 104 वर्ष (चेंबूर)
(तत्कालीन राजा -भगवत सिंह )
माता-पिता – माता का नाम अगयात |
पिता का नाम – माणेक चंद दोषी
इनकी दो बहनें थी, एक बहिन झबक बेन गरीब स्थिति एवं अंधी हो गई थी, सोनगढ़ में मरण
पत्नी का नाम- पहली 1. श्री मति मणिबेन, इनकी संतान नवल बेन (छोटी उम्र में गुजर गई )
2. श्री मति सुखी बेन 91वर्ष 3. शांता बेन
दूसरी पत्नी –  उनका नाम धनकुंवर बेन था |
संतान – 1.सुमनभाई (29 सितम्बर 1926-27 फरवरी 2014 )
2. दूसरी संतान – रमाबेन 3. बीजु बेन |
शिक्षा – 15 वर्ष की उम्र में गरीब स्थिति थी | गोंडल में स्ट्रीट लाइट में पढ़ते थे | जहां से मैट्रिक किया था बॉम्बे बोर्ड से 4500 छात्रों में आप मैट्रिक में 17वीं रैंक पर पास हुए थे | गोंडल स्टेट में 5 वर्ष ₹15 प्रति माह वेतन पर क्लर्क पद पर काम किया | फिर राजकोट आना हुआ तब अमृतलाल बक्शी वकील राजकोट के परिचय में आने पर उन्होंने इस होनहार विद्यार्थी को अपने पास एक वर्ष का एडवोकेट- बड़कालत की डिग्री कराई थी |
शील – बाई भोजन बनाकर चली जाती थी तब आकर ठंडा भोजन करते थे परंतु शील का उल्लंघन नहीं किया कभी भी |
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी – गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में नमक कानून पर रामजी भाई को 21 दिन को जेल में डाल दिया था वहां नाटक समयसार एवं कलश टीका पड़ी थी |

पूज्य रामजी भाई बापूजी (श्री रामजी भाई माणेकचंद दोशी) का पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के तत्व प्रचार और ‘दिगंबर जैन धर्म’ की प्रभावना में वही स्थान है जो महावीर भगवान के शासन में उनके गणधरों का रहा है । उन्हें गुरुदेव श्री के “प्रमुख शिष्य” और “शासन प्रभावक” के रूप में जाना जाता है । जब गुरुदेव श्री ने स्थानकवासी संप्रदाय छोड़कर दिगंबर धर्म की दीक्षा ली, तब रामजी भाई बापूजी ने ही सोनगढ़ (गुजरात) को केंद्र बनाकर वहां धर्म के प्रचार-प्रसार की नींव रखी । आज जो हम भव्य मंदिर और स्वाध्याय भवन देखते हैं, उनके पीछे बापूजी की दूरदृष्टि और प्रबंधन था । गुरुदेव के प्रवचनों को लिपिबद्ध करना और उन्हें ‘समयसार’ आदि ग्रंथों के साथ प्रकाशित कर जन-जन तक पहुँचाने में उनकी मुख्य भूमिका थी । उन्होंने ‘श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट’ के माध्यम से साहित्य की जो धारा बहाई, उसी के कारण आज घर-घर में तत्वज्ञान पहुँच सका है । रामजी भाई बापूजी ने गुरुदेव के उपदेशों को केवल सुना ही नहीं, बल्कि उन्हें एक अनुशासन और व्यवस्था दी। वे गुरुदेव के प्रति अत्यंत समर्पित थे । गुरुदेव अक्सर कहते थे कि “रामजी भाई ने शासन की जो सेवा की है, वह अतुलनीय है ।” देश-विदेश में फैले ‘मुमुक्षु मंडलों’ को संगठित करने और स्वाध्याय की पद्धति को सुदृढ़ करने का श्रेय बापूजी को जाता है । उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि गुरुदेव के बाद भी यह तत्वज्ञान का प्रवाह थमे नहीं । बापूजी का अपना जीवन एक आदर्श मुमुक्षु जैसा था। उन्होंने अपना पूरा जीवन, धन और शक्ति गुरुदेव की प्रभावना और जिनेन्द्र भक्ति में लगा दी। उन्हें ‘बापूजी’ का आदर उनके इसी पिता तुल्य संरक्षण और वात्सल्य के कारण मिला।यदि गुरुदेव श्री कानजी स्वामी “तत्व के सूर्य” थे, तो रामजी भाई बापूजी उस प्रकाश को चारों दिशाओं में फैलाने वाले “मुख्य वाहक” थे ।