07.-Lalchad-Bhai-Modiलालचन्द्र भाई मोदी

जन्म तिथि

लीम्बुडा तालुका मानाबदर सोराष्ट्र १६-६-१० – अवसान राजकोट में माह सूद ९ स. १९६२ में रात्रि १-२० पर २१-२-१९९८

माता-पिता का नाम

फूलबा एवं अमरचन्द्र मोदी १३-१४ वर्ष में माँ गुजर गई ।

शिक्षा  साधारण

 

परिवार

पहली पत्नी- १९ वर्ष में शांताबेन २ पुत्र १ पुत्री छोड़ कर गुजर गई | दूसरी पत्त्री नबल बेन से ३ पुत्र ३ पुत्री कांति भाई का पुत्र हिमांशु – ९२२५७७४८८५-२-दीपक की पत्री सीमा २- पानू भाई ३- प्रवीन ४- नितिन भाई कोलकाता ।

व्यवसाय

१८ वर्ष में नोकरी एवं व्यवसाय वेराबल एवं राजकोट में आकर बस गये सन १९५० में राजकोट में २६ – २७ की उम्र में डॉ बन चुके थे गुरुदेवश्री को इंजेक्शन देने आते थे ।

गुरुदेवश्री का परिचय

1-एक वर्ष शरणारामजी बढौत यु पी से लाभ लिया जिससे रूचि लगी | स.१९९६ में जेतपुर में प्रथम परिचय हुआ

रचनात्मक कार्य

४० कि उम्र में स्वाध्याय करने के बाद ४४ कि उम्र में प्रवचन प्रारम्भ | भारत में अध्यात्म कि धूम मचा दी थी |

परमागम प्रतिष्ठा में माता-पिता बने थे परन्तु ब्र. पहले से ही पालते थे । गुरुदेवश्री बोले- “आ प्रतिगया न वल वेन माटे छै ।”

प्रेरक प्रसंग

2-गुरुदेवश्री – प्रवचन में आते हो ? धर्म का परिचय नहीं/ आया करो |

3-गुरुदेव ने श्रीमदजी वचनामृत दिया |

4- एक वार लालुभाई राजकोट मुरेना पधारे वहाँ उन्हें पंचास्तिकाय ग्रंथ मिला तो खरीदना चाहा | परंतु वह देना नहीं चाहता था | तो 200/- रु देकर खरीदा था ।

लालचंद भाई मोदी का पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के आध्यात्मिक मार्ग और सोनगढ़ आंदोलन की प्रभावना में एक अत्यंत विशिष्ट और आधारभूत योगदान रहा है । उन्हें गुरुदेव के “प्रमुख स्तंभों” में गिना जाता है ।

लालचंद भाई मोदी केवल एक अनुयायी नहीं, बल्कि जैन दर्शन के गहरे जानकार और मनीषी थे । उन्होंने गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित ‘निश्चय-व्यवहार’ और ‘द्रव्य-गुण-पर्याय’ जैसे सूक्ष्म विषयों पर बहुत स्पष्ट और प्रभावशाली प्रवचन दिए । उन्होंने गुरुदेव के गंभीर उपदेशों को जिज्ञासुओं के लिए अधिक सुगम बनाया । बाबू जुगल किशोर जी जहाँ प्रशासनिक पक्ष संभालते थे, वहीं लालचंद भाई ने वैचारिक पक्ष को मजबूत किया। उन्होंने स्वाध्याय प्रेमियों के बीच गुरुदेव के विचारों की प्रामाणिकता  को आगम (शास्त्रों) के आधार पर सिद्ध किया, जिससे विद्वत जगत में गुरुदेव की बात को सम्मान मिला । उन्होंने स्वयं एक आदर्श मुमुक्षु जीवन जीकर समाज को यह दिखाया कि तत्वज्ञान केवल सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में उतारने की कला है । उनके संयमित और विचारशील व्यक्तित्व ने कई युवाओं को इस मार्ग की ओर आकर्षित किया । उन्होंने अनेक लेखों और सम्बोधनों के माध्यम से दिगंबर जैन धर्म की प्राचीन परंपरा और गुरुदेव के आध्यात्मिक क्रांति के समन्वय को स्पष्ट किया । उनके प्रवचनों के संकलन आज भी मुमुक्षु समाज में बड़े चाव से पढ़े जाते हैं क्योंकि उनमें ‘वस्तु स्थिति’ को समझाने की अद्भुत क्षमता है । लालचंद भाई का गुरुदेव के प्रति समर्पण अटूट था । उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुदेव के सानिध्य में तत्व चर्चा करते हुए बिताया। गुरुदेव भी उनकी मेधा और तत्व रुचि का बहुत सम्मान करते थे । यदि गुरुदेव श्री कानजी स्वामी इस आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता थे, तो लालचंद भाई मोदी उस क्रांति के ऐसे प्रखर व्याख्याता थे जिन्होंने तर्कों और आगम के मेल से इस मार्ग को निष्कंटक बनाया ।