ब्रह्मचारी वजुभाई

बजुभाई शाह
जन्म – चम्पाबेन से ८-१० वर्ष बड़े भाई थे |
पुत्र – प्रवीन भाई भावनगर बेंक में सेवारत थे —गुजर गए।
जितेन्द्र भाई मुंबई वर्तमान में सोनगढ़ के ट्रस्टी हैं।
सरकारी सेवा – प्रथम श्रेणी के इंजिनीयर थे | वांकानेर भावनगर के राजघरानों में सम्मान था |
समोशरण मंदिर एवं परमागम मंदिर निर्माण में इन्जीनीरिंग का भार सम्हाला | विचारों में भारतीयता |

ब्रह्मचारी वजु भाई शाह (ब्रह्मचारी वजूभाई) का गुरुदेव श्री कांजी स्वामी के शासन और उनकी प्रभावना में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आधारभूत योगदान रहा है। उन्हें गुरुदेव के “दाहिने हाथ” और दिगंबर जैन धर्म के आध्यात्मिक क्रांति के प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है। उन्होंने न केवल संपादन किया, बल्कि स्वयं भी अत्यंत मौलिक और गहरे आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की।

वजु भाई शाह ने गुरुदेव श्री के गहन आध्यात्मिक प्रवचनों और दिगंबर जैन आगमों (जैसे समयसार, प्रवचनसार) को जन-साधारण के लिए सरल भाषा में उपलब्ध कराया। उन्होंने जटिल दार्शनिक सिद्धांतों को सुबोध बनाया ताकि एक सामान्य मुमुक्षु भी उसे आत्मसात कर सके।

सोनगढ़ (गुजरात) को आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने में उनकी प्रबंधकीय कुशलता का बड़ा हाथ था। गुरुदेव श्री के सानिध्य में मुमुक्षु मंडल की स्थापना और स्वाध्याय की परंपरा को व्यवस्थित करने में वे सदैव अग्रणी रहे।

गुरुदेव श्री की शिक्षाओं को घर-घर पहुँचाने के लिए उन्होंने ‘आत्मधर्म’ पत्रिका के माध्यम से अपूर्व प्रभावना की। उनके लेखन में स्पष्टता, निर्भीकता और तत्व का गहरा चिंतन झलकता था, जिसने हज़ारों जिज्ञासुओं को सही मार्ग दिखाया।

उन्होंने अपना पूरा जीवन ब्रह्मचर्य व्रत के साथ गुरुदेव के चरणों में समर्पित कर दिया। उन्होंने न केवल गुजरात में, बल्कि पूरे भारत में भ्रमण कर गुरुदेव द्वारा बताए गए कुंदकुंद आचार्य के सिद्धांतों (निश्चय नय और शुद्धातम तत्व) का प्रचार-प्रसार किया । वे केवल श्रद्धा की बात नहीं करते थे, बल्कि ‘न्याय’ (logic) से बात सिद्ध करते थे । वे शब्दों के जाल में उलझाने के बजाय सीधे ‘आत्मा’ के अनुभव पर जोर देते थे। उनका हर वाक्य कुंदकुंद आचार्य या अन्य दिगंबर संतों के मूल आगमों से प्रमाणित होता था । वजु भाई को “तत्व का शेर” कहा जाता था, क्योंकि वे सभाओं में बहुत ही निर्भीकता और स्पष्टता के साथ दिगंबर जैन धर्म के शुद्ध निश्चय नय का प्रतिपादन करते थे।

वजु भाई शाह की सबसे बड़ी विशेषता उनकी तत्व-निष्ठा थी। उन्होंने गुरुदेव के प्रति अटूट भक्ति रखते हुए भी हमेशा ‘तत्व’ (सिद्धान्त) को प्रमुखता दी, जिससे मुमुक्षु समाज को वस्तु-स्वरूप समझने में दृढ़ता मिली।