पण्डित जतिशचंद्र शास्त्री

जतीश भाई सनावद

जन्म तिथि एवं ग्राम – ७ जन १९४१ सनावद
माता-पिता का नाम – श्रीमती धर्मवती – श्रीमान जवर चन्द्र जैन ७ भाई १ बहिन हैं।
बहिन –  राजकुमारी, १- भाइ डॉ. जगदीश इंदौर, ३- सतीश चन्द्र जैन, ४- जनीश
चन्द्र, ५- दिनेश चन्द्र, ६- नरेंद्र कुमार, ७- डॉ जैनेन्द्र जैन कनाडा,

माता-पिता  – दोनों की तात्विक रूचि थी, बच्चों में तत्व की प्रेरणा करती थी । बहुओं को भी रूचि में निमित्त बनी | आज सम्पूर्ण परिवार में तात्विक रूचि धार्मिक संस्कार, सम्पूर्ण महिलाओं में कोई भी मतभेद नहीं है। बड़े प्रेम से मिलकर रहते हैं

शिक्षा –  शास्त्री प्रथम बेच जयपुर से।
सोनगढ़ परिचय –  २२ वर्ष की उम्र में चाचा कवर चन्द्रजी के साथ गये वे वहाँ 3-3 माह रहा करते थे । २० वर्ष मौन पूर्वक रामजी भाई के साथ रहे।
प्रतिष्ठा – १९८३ भोपाल में विधान एवं २००१ फर में ग्वालियर से पञ्च कल्याणक आत, आत्मार्थी ट्रस्ट दिल्ली  मंत्री पद, कन्या छात्रावास प्रारम्भ २००७ से।
प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी जतीश भाई शास्त्री (सनावद), जैन समाज के एक प्रतिष्ठित विद्वान और प्रतिष्ठाचार्य हैं। गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के आध्यात्मिक मार्ग (दिगंबर जैन धर्म) की प्रभावना में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी माना जाता है।

जतीश भाई ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवों के माध्यम से गुरुदेव श्री द्वारा बताए गए ‘वीतराग विज्ञान’ और ‘कुन्दकुन्द-कहान’ मार्ग को जन-जन तक पहुँचाया है। वे प्रतिष्ठा के दौरान केवल क्रियाकांड पर ही नहीं, बल्कि उसके पीछे के अध्यात्म और भाव पक्ष पर विशेष जोर देते हैं।

समाज में प्रतिष्ठा विधियों और सूरिमन्त्र को लेकर जो भ्रांतियाँ थीं, उन्हें दूर करने में जतीश भाई का बड़ा योगदान है। उन्होंने विभिन्न विद्वत गोष्ठियों (जैसे सिंगोली गोष्ठी) में भाग लेकर आगम के आधार पर यह स्पष्ट किया कि जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा की सही विधि क्या है, जिससे मुमुक्षु समाज में सैद्धांतिक स्थिरता आई।

एक बाल ब्रह्मचारी के रूप में उनका जीवन स्वयं में एक प्रभावना है। वे गुरुदेव श्री के सिद्धांतों के अनुरूप संयमित और स्वाध्यायपूर्ण जीवन जीते हैं, जो युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का केंद्र है। वे न केवल प्रतिष्ठा कराते हैं, बल्कि ‘समयसार’ और अन्य ‘समयसार’ जैसे महान ग्रंथों पर सरल भाषा में मार्मिक प्रवचन भी करते हैं। उनके प्रवचनों में गुरुदेव श्री की शैली की झलक मिलती है, जहाँ वे ‘निश्चय और व्यवहार’ के सुमेल को बहुत स्पष्टता से समझाते हैं।

सनावद और उसके आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ देश-विदेश में होने वाले धार्मिक आयोजनों में वे एक कुशल मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। उनके सान्निध्य में होने वाले आयोजन अनुशासन और आध्यात्मिक उल्लास के लिए जाने जाते हैं।