पंडित खेमचंद भाई सेठ

पंडित खेमचंद जी सेठ

जन्म तिथि – तिथवा जिला बान्कानेर (सन् 1959 वैशाख वदी 7/18-5-1903  12-8-1983)
माता पिता – पुतली बेन,
 पिता का नाम – जेठाभाई।
भाइयों के नाम –  1  मणिभाई 2  शिवलाल भाई  3. रमणीक लाल
शिक्षा – स्थानक वासी HSC शिक्षक थे सबसे पहले मोलमीन वर्मा कोलकाता (1934)
परिवार – पत्नी का नाम जयाबेन (1927 में विवाह)-
पुत्री – 1 हीराबेन पटेल (20-10-1925)
2 शांता बेन संघवी (17-07-1927)
3.चम्पाबेन संहावी (28-9-1931) मोलमीन
4. ब्र. भानुबेन सेठ (मोलमीन में 6-4-1936 में जन्म,9-9-1956, स वर्ष में ब्रह्मचर्य)
व्यवसाय – बोम्बे में पढ़ाने का कार्य किया।
आर्थिक स्थिति –  जेठालालजी की ठीक न थी अतः पढ़ते समय भी पढ़ाने का कार्य करते थे। सारे भाई बहिनों को पढ़ाया।
गुरुदेवश्री का परिचय- इसी समय सन् 1940 खेमजी भाई राजकोट भी सम्पर्क में आ गये। स. 2000 सन् 1944 से सोनगढ रहे यहीं भानुबेन का जन्म हुआ जिसकी शिक्षा यहां हुई और आजीवन ब्रः कर अभी भी रह रहीं हैं। 1944 चातुर्मास में गुरुदेव के विशेष सम्पर्क में आये।
मोलमीन में गुजराती भाइयों का मण्डल बनाकर श्रीमद् राजचंद्र का वांचन करते थे। यहां से गुरुदेव श्री के प्रवचनों के पत्र मंगाकर उन पर प्रवचन करते थे।
” यदि रामजी भाई भीष्म पितामह थे तो खेमचंद्र जी सोनगढ़ के युधिष्टर थे।”
– डॉ भारिल्ल

पंडित खेमचंद भाई जी का जैन धर्म और विशेष रूप से कानजी स्वामी (गुरुदेव श्री) के आध्यात्मिक संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्हें गुरुदेव के अनन्य प्रभावक और समर्पित अनुयायी के रूप में जाना जाता है।

पंडित खेमचंद भाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरल भाषा थी। गुरुदेव श्री के गूढ़ आध्यात्मिक और समयसार के सिद्धांतों को वे सामान्य जनमानस की भाषा में इस तरह समझाते थे कि एक साधारण व्यक्ति भी आत्म-कल्याण के मार्ग को समझ सके। उन्होंने जटिल दार्शनिक तथ्यों को सरल उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया । उन्होंने गुरुदेव के उपदेशों और दिगंबर जैन धर्म के सिद्धांतों पर आधारित कई लेख और साहित्य की रचना की। उनके द्वारा लिखे गए भक्ति गीत और विवेचनाएँ आज भी स्वाध्याय केंद्रों और सभाओं में बड़े चाव से पढ़ी और सुनी जाती हैं। उन्होंने आगम के परिप्रेक्ष्य में गुरुदेव की बातों को पुष्ट करने का कार्य किया । खेमचंद भाई ने केवल गुजरात या भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी जाकर गुरुदेव श्री के तत्वों का प्रचार किया। उनकी ओजस्वी वाणी और शांत व्यक्तित्व ने कई मुमुक्षुओं (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) को आत्म-धर्म की ओर प्रेरित किया। उन्होंने अनेक ‘विधान’ और ‘शिविरों’ का कुशल संचालन किया ।

उन्होंने गुरुदेव के अनुयायियों (मुमुक्षु समाज) को संगठित करने और उन्हें स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) के प्रति जागरूक करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगाई। सोनगढ़ (गुजरात) के आध्यात्मिक केंद्र की गतिविधियों और वहां के उत्सवों में उनकी सक्रिय भूमिका हमेशा स्मरणीय रही । उनका अपना जीवन गुरुदेव के प्रति पूर्ण समर्पण का एक उदाहरण था । उनकी निष्ठा और विनय ने अन्य अनुयायियों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया, जिससे गुरुदेव की शिक्षाओं के प्रति लोगों की श्रद्धा और अधिक गहरी हुई ।