हमारे प्रेरणादायक साधकत्रय
मनुष्य जीवन की सार्थकता आत्मा की निर्विकल्प अनुभूति तक पहुंचने में ही है, सच्चे मोक्ष मार्ग की शुरुआत यहीं से होती है मगर वह दुर्लभ है। इस विषम काल में बहुत कम साधक इस मुकाम पर पहुंच सकते हैं उसमें निमित्त तो गुरुवर त्रय की प्ररूपणा ही है। श्रीमद् राजचंद्र जी के हाथ आचार्य कुंदकुंद के आगम आये और उन्हें देख वे बहुत उल्लसित हुए और 23 साल की उम्र में आत्मा की निर्विकल्प अनुभूति कर ली । बहनश्री चम्पाबहन गुरुदेवश्री कानजी स्वामी की भक्त शिरोमणि थी और उनके उपदेश और कुंदकुंद और अमृतचंद्र आचार्य के आगम के माध्यम से 18 वर्ष की आयु में निर्विकल्प अनुभूति कर ली। निहालचंद सोगानी जी वैसे तो दिगम्बर जैन गृहस्थ थे और मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत बैचेन थे, उनके हाथ जब सोनगढ़ से प्रकाशित आत्मधर्म पत्रिका आई और उसमें छपा कि षट् आवश्यक की कोई जरूरत नहीं है निश्चय से एक आत्मा ही लक्ष्य करने योग्य है इस एक बात ने उन्हें अंदर से टटोल दिया और उन्होंने सोनगढ़ आकर गुरुदेव के दर्शन का मन बना लिया । वे सोनगढ़ आए और गुरुदेवश्री के एक ही प्रवचन सुनकर इतने आत्मोल्लसित हो गए और शाम को समिति के मकान पर आकर ध्यान की धुनी लगा दी और रातभर ऐसे मग्न हुए सुबह होते होते उन्होंने आत्मा का आस्वाद ले लिया। उन्होंने अपना जीवन निहाल कर लिया।

